'पापा ने काम को ही मेरे इर्द-गिर्द बुन दिया, मुझे उनसे सादगी विरासत में मिली'

मैं बचपन से दो घरों में रही। एक पिताजी गुलज़ार और दूसरा मां राखी का घर। मुझे अपने पिता की सादगी बहुत पसंद है। उन्होंने हमेशा मुझे आज़ादी दी, बचपन में मेरी शैतानियों के बावजूद उन्होंने मुझसे कभी ऊंची आवाज में बात नहीं की। उन्हें कविताओं और लेखन पर लगातार मिलने वाली तारीफों पर मुझे हमेशा आश्चर्य होता था। लोग मुझसे पूछते हैं कि पिता की कोई खासियत जो आप जीवनसाथी में खोजती हों, मैं कहती हूं कि मैं इससे खुश हूं कि दोनों बिल्कुल अलग तरह की शख्सियत हैं। मेरा मानना है कि पिताजी से मुझे सादगी विरासत में मिली है।

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